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दिल्ली के बिजवान गांव की मस्जिद में 10 महीने से अज़ान और बाहरी लोगो के नमाज पढ़ने पर लगी हुई है रोक :रिपोर्ट

नई दिल्ली में एक नवनिर्मित मंदिर से सटी बिजवासन जामा मस्जिद नई दिल्ली, 23 जून | हरयाणा की सीमा से लगे दिल्ली के बिजवासन गाँव में कुछ अराजक तत्वों ने कथित तौर पर पिछले 10 महीने से बाहरी लोगों के जुमा पढ़ने पर पाबंदी लगा रखी है जिसे लेकर आस-पास के इलाकों से इस मस्जिद में जुमा पढ़ने आने वालों में काफी नाराज़गी है.

न्यूज वेबसाइट इंडिया टुमारो की ग्राउंड रिपोर्ट में ये बात भी सामने आई है कि गाँव के दबंगों ने माइक से अज़ान देने पर भी रोक लगा रखी है. मस्जिद में ज़्यादा लोगों के नमाज़ पढ़ने पर भी दबंगों ने ऐतराज़ जताया है.आरोप है कि मामला थाने तक जाता है लेकिन आबादी और माहौल का हवाला देकर मुस्लिम पक्ष को समझा बुझाकर शांत करा दिया जाता है.

गाँव में पांच मुस्लिम परिवार हैं. दबंगों का कहना है कि गाँव के लोग नमाज़ पढ़ें लेकिन बाहरी लोगों को हम यहां नमाज़ नहीं पढ़ने देगें. गाँव के मूल निवासी तो 5 परिवार ही हैं मगर गुडगाँव में नौकरी करने वाले सैकड़ों मुसलमान आस-पास रहते हैं जो जुमे की नमाज़ पढ़ने बिजवासन की मस्जिद में ही आते हैं.

बिजवासन गाँव का सैकड़ों साल पुराना सौहार्द पूर्ण इतिहास रहा है. गांव जाट बाहुल्य है और मुसलमानों से बहुत अच्छे आपसी सम्बन्ध रहे हैं मगर पिछले साल सितम्बर के महीने से माहौल को ख़राब करने की कोशिश की गई और बाहरी लोगों के जुमे की नमाज़ पढ़ने पर पाबन्दी लगा दी गई۔

इंडिया टुमारो से बात करते हुए गाँव के ही डॉ० इंतज़ार ख़ान कहते हैं, “साल 2019 के सितम्बर से ये सब मामला शुरू हुआ है जब जुमे की नमाज़ को लेकर स्थानीय भाजपा नेता के नेतृत्व में कुछ युवा आस-पास के लोगों को जुमे की नमाज़ पढ़ने पर मना करने लगे.

उन्होंने बताया, “शुरू में उन्होंने मस्जिद के बाहर नमाज़ पढ़ने पर आपत्ति जताई. उनकी ये बात मान ली गई और जुमे की नमाज़ में मस्जिद के अन्दर ही लोगों को नमाज़ पढ़ने को कहा गया. मगर बाद में माइक से अज़ान देने पर भी एतराज़ जताया जाने लगा. यहां तक की मस्जिद के अन्दर नमाज़ पढ़ाने के लिए जिस माइक का इस्तेमाल किया जाता है उसे भी आकर बंद कराने लगे.”डॉ० इंतज़ार कहते हैं, “मस्जिद के ठीक बगल में कुंआ था जो की गाँव का था जहां पर तनाव बढ़ने के बाद मंदिर बना ली गई. हमने कभी कोई एतराज़ नहीं किया मगर अराजक तत्वों ने जुमे को मस्जिद की गली पर लाठी लेकर युवकों को खड़ा कर दिया ताकि कोई बाहरी व्यक्ति नमाज़ को न आए.

गाँव के प्रधान शब्बीर ख़ान ने इंडिया टुमारो को बताया कि, “लॉकडाउन के कई महीने पहले से हमारी मस्जिद में माइक से अज़ान देने पर पाबन्दी लगा दी गई, बाहरी लोगों को जुमे की नमाज़ पढ़ने से रोका गया जिससे हम बहुत परेशान हैं.”उन्होंने कहा, “सितम्बर महीने में माहौल को ख़राब होता देख हमने भी बाहरी लोगों को आने से मना किया ताकि तनावपूर्ण माहौल सामन्य हो जाए. मगर अब लगभग 10 महीने हो गए मगर हमारी मस्जिद में माइक से अज़ान और बाहरी लोगों के जुमे की नमाज़ पढ़ने पर रोक है.”

शब्बीर ने बताया, “मस्जिद के ठीक बगल में कुंआ था जो ग्राम सभा का था मगर वहां मंदिर बनाई गई. हमने इसमें सहयोग किया. मगर हमें तो हमारी मस्जिद में आज़ादी से अज़ान देने और नमाज़ पढ़ने की आज़ादी मिलनी चाहिए.”मस्जिद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि बताते हुए शब्बीर कहते हैं, “पहले ये कच्ची मस्जिद थी. इस मस्जिद का मामला आज़ादी से पहले लाहौर हाईकोर्ट में चल रहा था जिसे मुसलमान हार गए थे. बाद में आज़ादी के बाद 1986 में गांव के ही जाट बुज़ुर्गों ने मिलकर मस्जिद बनवाई थी.

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